जब भी किसी बॉलीवुड फिल्म पर कट लगता है, डायलॉग म्यूट होता है या रिलीज़ अटकती है, तो एक ही नाम सबसे पहले ज़हन में आता है — Censor Board। लेकिन क्या वाक़ई हमें पता है कि ये बोर्ड कैसे काम करता है, किन क़ानूनी बुनियादों पर फैसले लिए जाते हैं और फिल्म दर्शकों तक पहुँचने से पहले किन-किन मरहलों से गुज़रती है? यह लेख उसी पूरे सिस्टम को आसान, इंसानी और ज़मीनी नज़र से समझाने की कोशिश है।
फिल्म रिलीज़ से पहले जब भी कोई विवाद खड़ा होता है, आम दर्शक के लिए कहानी वहीं खत्म हो जाती है — “सेंसर ने काट दिया।”
लेकिन असल सवाल कहीं ज़्यादा गहरा है। क्या वाक़ई हमें पता है कि Censor Board के नियम कैसे काम करते हैं?
या फिर हम सिर्फ़ सुनी-सुनाई बातों और सोशल मीडिया के शोर पर भरोसा कर लेते हैं?
हक़ीक़त ये है कि जिसे हम रोज़मर्रा की ज़बान में Censor Board कहते हैं, उसका असली नाम Central Board of Film Certification यानी CBFC है।
यह फर्क सिर्फ़ नाम का नहीं, बल्कि सोच और ज़िम्मेदारी का भी है। “Censor” का मतलब रोकना या काटना होता है, जबकि “Certification” का मतलब है — सही वर्ग में पहचान देना।
इस लंबे, गहराई वाले और magazine-grade लेख में हम पूरे इत्मिनान से समझेंगे कि आखिर Censor Board के नियम कैसे काम करते हैं, ये बोर्ड करता क्या है, कहां इसकी सीमाएं हैं और कहां इसकी ज़िम्मेदारियां शुरू होती हैं।
📑 फ़हरिस्त
- Censor Board क्या है और क्या नहीं
- फिल्म Censor Board तक कैसे पहुँचती है
- Examining Committee कौन होती है
- फिल्म में क्या-क्या देखा जाता है
- Certification Categories का मतलब
- कट्स और म्यूट्स कैसे तय होते हैं
- OTT बनाम Cinema का फर्क
- भविष्य में क्या बदल सकता है
- FAQ – आम सवाल, सीधे जवाब
🎥 Censor Board क्या है — और क्या नहीं
सबसे पहले एक बहुत ज़रूरी ग़लतफ़हमी साफ़ करना ज़रूरी है।
Censor Board कोई ऐसी ताक़त नहीं है जो मनमानी से फिल्मों को बर्बाद करने बैठी रहती है।

हां, इसके कई फैसले बहस के क़ाबिल होते हैं, मगर पूरा सिस्टम क़ानून के दायरे में चलता है।
CBFC भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत काम करता है।
इसका असली मक़सद फिल्मों को सर्टिफ़िकेट देना है — ताकि दर्शक पहले से जान सके कि वो किस तरह की फिल्म देखने जा रहा है।
यानी बोर्ड ये तय करता है कि:
- फिल्म हर उम्र के लिए ठीक है या नहीं
- क्या बच्चों के लिए इसमें कोई नाज़ुक कंटेंट है
- या ये फिल्म सिर्फ़ वयस्क दर्शकों के लिए है
यहां से समझ में आता है कि Censor Board के नियम कैसे काम करते हैं — ये सिर्फ़ नैतिकता नहीं, बल्कि सामाजिक असर और ज़िम्मेदारी का हिसाब भी रखते हैं।
📂 फिल्म Censor Board तक कैसे पहुँचती है
कोई भी फिल्म सीधे थिएटर में नहीं पहुँच जाती।
रिलीज़ से पहले उसे एक तयशुदा और क़ानूनी रास्ते से गुज़रना पड़ता है।
जब फिल्म पूरी तरह तैयार हो जाती है —
फाइनल कट लॉक हो जाता है, बैकग्राउंड स्कोर और डायलॉग पूरे हो जाते हैं — तब प्रोड्यूसर Censor Board के पास आवेदन करता है।
इस आवेदन के साथ:
- फिल्म का अंतिम संस्करण
- ज़रूरी क़ानूनी दस्तावेज़
- निर्धारित फीस
जमा की जाती है।
इसके बाद CBFC फिल्म देखने के लिए एक Examining Committee बनाता है।
यहीं से असल प्रक्रिया शुरू होती है — और यहीं से तय होना शुरू होता है कि फिल्म को किस नज़र से देखा जाएगा।
👥 Examining Committee कौन होती है
Examining Committee कोई एक इंसान नहीं होता।
यह अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए लोगों की एक टीम होती है, जिन्हें बोर्ड द्वारा नामित किया जाता है।

इनमें शामिल हो सकते हैं:
- पुरुष और महिला सदस्य
- अलग-अलग सामाजिक वर्गों से लोग
- सिनेमा देखने और समझने का अनुभव रखने वाले सदस्य
इनका काम फिल्म को पूरे ध्यान से देखना होता है —
सिर्फ़ फिल्ममेकर की नीयत नहीं, बल्कि दर्शक पर पड़ने वाले असर को भी परखा जाता है।
यही वो मरहला है जहां ये तय होना शुरू होता है कि Censor Board के नियम कैसे काम करते हैं और किस संदर्भ में लागू होते हैं।
📑 फ़हरिस्त
- Censor Board फिल्म में क्या-क्या देखता है
- हिंसा, सेक्स और भाषा का पैमाना
- धर्म, राजनीति और संवेदनशीलता
- Certification Categories का असली मतलब
- कट्स, म्यूट्स और बदलाव कैसे तय होते हैं
- Revising Committee और अपील का रास्ता
🔍 Censor Board फिल्म में क्या-क्या देखता है
सबसे आम सवाल यही होता है — “आख़िर बोर्ड को इतनी आपत्ति क्यों होती है?”
असल में Censor Board फिल्म को एक ही चश्मे से नहीं देखता।
वो हर सीन को उसके सामाजिक असर, संदर्भ और दर्शक पर पड़ने वाले प्रभाव के साथ परखता है।
यही वजह है कि दो अलग-अलग फिल्मों में एक जैसा सीन होने के बावजूद, एक को मंज़ूरी मिल जाती है और दूसरी पर सवाल उठते हैं।
यानी यहां फ़ैसला सिर्फ़ कंटेंट का नहीं, context का भी होता है।
इसी बिंदु पर आकर साफ़ समझ में आता है कि Censor Board के नियम कैसे काम करते हैं — ये नियम किताबों से ज़्यादा हालात से जुड़े होते हैं।
🩸 हिंसा, सेक्स और भाषा का पैमाना
सबसे ज़्यादा आपत्तियां इन तीन चीज़ों पर आती हैं —
हिंसा, यौन दृश्य और भाषा।

अगर किसी फिल्म में हिंसा कहानी की ज़रूरत है, तो उसे पूरी तरह रोका नहीं जाता।
लेकिन अगर खून-ख़राबा सिर्फ़ सनसनी फैलाने के लिए है, तो बोर्ड सवाल उठाता है।
यौन दृश्यों के मामले में भी यही नियम लागू होता है।
इशारों में कही गई बात और खुले प्रदर्शन में बड़ा फर्क माना जाता है।
भाषा यानी गालियां — ये आज के सिनेमा का सबसे विवादित हिस्सा हैं।
शहरी दर्शक जिस भाषा को “real” मानते हैं, वही भाषा छोटे शहरों और पारिवारिक दर्शकों के लिए असहज हो सकती है।
इसलिए बोर्ड कई बार म्यूट या बदलाव का सुझाव देता है, न कि पूरा सीन हटाने का।
🕌 धर्म, राजनीति और संवेदनशीलता
भारत जैसे देश में धर्म और राजनीति बेहद नाज़ुक विषय हैं।
एक सीन, एक संवाद या एक प्रतीक भी बड़े विवाद का कारण बन सकता है।
Censor Board यहां अतिरिक्त सावधानी बरतता है।
इसका मक़सद अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचलना नहीं, बल्कि सामाजिक टकराव को टालना होता है।
कई बार फिल्ममेकर इसे ज़्यादा सतर्कता मानते हैं, लेकिन बोर्ड के नज़रिए से ये एक तरह की preventive responsibility है।
यहीं से वो बहस जन्म लेती है, जो हर बार दोहराई जाती है —
क्या ये सुरक्षा है या ज़रूरत से ज़्यादा नियंत्रण?
🎫 Certification Categories का असली मतलब
Censor Board चार मुख्य categories में फिल्म को सर्टिफ़िकेट देता है:
- U – हर उम्र के दर्शकों के लिए
- U/A – बच्चों के लिए माता-पिता की निगरानी ज़रूरी
- A – सिर्फ़ 18 वर्ष से ऊपर
- S – विशेष वर्ग के लिए
अक्सर विवाद यहीं से शुरू होता है।
फिल्ममेकर चाहते हैं U/A, ताकि दर्शक ज़्यादा हों।
लेकिन कंटेंट अगर ज़्यादा परिपक्व है, तो बोर्ड A सर्टिफ़िकेट देता है।
यहां भी साफ़ दिखता है कि Censor Board के नियम कैसे काम करते हैं — ये व्यावसायिक हित और सामाजिक ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन ढूंढते हैं।
✂️ कट्स, म्यूट्स और बदलाव कैसे तय होते हैं
जब Examining Committee अपनी रिपोर्ट दे देती है, तो बोर्ड फिल्ममेकर को सुझाव भेजता है।
ये सुझाव आम तौर पर तीन तरह के होते हैं:
- डायलॉग म्यूट करना
- सीन छोटा करना
- या किसी हिस्से को पूरी तरह हटाना
कई मामलों में सिर्फ़ एक शब्द या एक आवाज़ हटाने से ही बात बन जाती है।
यानी हर आपत्ति का मतलब ये नहीं कि पूरी फिल्म पर कैंची चल जाए।
यहीं पर फिल्ममेकर और बोर्ड के बीच सबसे ज़्यादा टकराव होता है।
🔁 Revising Committee और अपील का रास्ता
अगर फिल्ममेकर Examining Committee के फैसले से संतुष्ट नहीं होता, तो उसके पास Revising Committee का विकल्प होता है।

Revising Committee ज़्यादा वरिष्ठ सदस्यों से बनती है और फिल्म को दोबारा देखती है।
कई बार Revising Committee पहले के सुझावों को नरम कर देती है या पूरी तरह हटा भी देती है।
और अगर यहां भी बात न बने, तो फिल्ममेकर अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकता है।
इस पूरी प्रक्रिया से एक बात साफ़ होती है —
Censor Board के नियम कैसे काम करते हैं, ये किसी एक कमरे में लिया गया फ़ैसला नहीं, बल्कि कई स्तरों से गुज़रने वाली प्रक्रिया है।
📺 OTT बनाम Cinema: सेंसर का फर्क यहीं से शुरू होता है
पिछले कुछ सालों में एक सवाल बार-बार उठता रहा है —
अगर OTT प्लेटफॉर्म्स पर इतना खुला कंटेंट दिखाया जा सकता है, तो वही बात थिएटर में क्यों अटक जाती है?
यही सवाल Censor Board के नियम कैसे काम करते हैं को आज के दौर में और ज़्यादा पेचीदा बना देता है।
असल फर्क जगह का है।
Cinema hall एक सार्वजनिक स्थान है। यहां हर उम्र, हर तबके और हर पृष्ठभूमि का दर्शक आ सकता है।
इसलिए सरकार और क़ानून की नज़र में थिएटर में दिखाई जाने वाली फिल्म का सामाजिक असर कहीं ज़्यादा माना जाता है।
इसके उलट OTT एक निजी चुनाव है।
मोबाइल, लैपटॉप या टीवी पर, अपने घर की चारदीवारी में, अपनी मर्ज़ी से देखा जाने वाला कंटेंट।
इसी वजह से OTT प्लेटफॉर्म्स पर CBFC जैसी पूर्व-सेंसरशिप नहीं होती, बल्कि self-regulation का मॉडल लागू है।
🧭 Self-Regulation: आज़ादी या ज़िम्मेदारी?
OTT प्लेटफॉर्म्स अपने लिए खुद guidelines बनाते हैं —
age rating, content warning और parental controls।

काग़ज़ पर ये सिस्टम संतुलित लगता है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त ये है कि हर प्लेटफॉर्म इन नियमों को एक-सी सख़्ती से लागू नहीं करता।
यहीं से आलोचक कहते हैं कि cinema पर ज़्यादा पाबंदी है और OTT पर खुली छूट।
लेकिन क़ानूनी नज़र से देखें तो फर्क साफ़ है —
Cinema mass exposure है, OTT opt-in exposure।
इस बारीक फर्क को समझे बिना ये समझना मुश्किल है कि Censor Board के नियम कैसे काम करते हैं और क्यों काम करते हैं।
🔮 भविष्य में Censor Board कैसे बदलेगा?
CBFC खुद भी समय के साथ बदल रहा है।
अब ज़ोर “censor” शब्द पर नहीं, बल्कि “certification” पर दिया जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में बोर्ड के फैसलों में ये बदलाव साफ़ दिखा है:
- कट्स को आख़िरी विकल्प माना जाना
- context-based evaluation
- age classification पर ज़्यादा ध्यान
आने वाले समय में संभव है कि:
- OTT के लिए ज़्यादा standardized guidelines आएं
- दर्शकों को content चुनने की ज़्यादा स्पष्ट जानकारी मिले
- फिल्ममेकर और बोर्ड के बीच संवाद बढ़े
यानि भविष्य का रास्ता नियंत्रण से ज़्यादा संतुलन की तरफ़ जाता दिखाई देता है।
❓ FAQ – Censor Board को लेकर आम सवाल
Q1. क्या Censor Board फिल्मों को बैन कर सकता है?
सीधे-सीधे बैन करना बोर्ड का मक़सद नहीं होता।
ज़्यादातर मामलों में सर्टिफ़िकेशन या बदलाव सुझाए जाते हैं।
बैन जैसी स्थिति बहुत ही दुर्लभ होती है।
Q2. क्या Censor Board सिर्फ़ बॉलीवुड फिल्मों पर लागू होता है?
नहीं।
CBFC सभी भाषाओं की फिल्मों पर लागू होता है — चाहे वो हिंदी हो, तमिल, तेलुगु या कोई और क्षेत्रीय सिनेमा।
Q3. क्या OTT कंटेंट कभी Censor Board के दायरे में आएगा?
पूरी तरह cinema जैसा censorship मॉडल आने की संभावना कम है।
लेकिन guidelines और accountability ज़रूर बढ़ सकती है।
Q4. क्या हर कट ज़रूरी होता है?
हर कट से सहमत होना ज़रूरी नहीं, लेकिन हर कट मनमानी भी नहीं होता।
ज़्यादातर फैसले सामाजिक असर और क़ानूनी सीमाओं को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं।
🧩 आख़िरी बात
Censor Board को या तो पूरी तरह दोषी ठहराना आसान है, या फिर उसे समाज का रक्षक मान लेना।
लेकिन सच्चाई हमेशा इन दोनों के बीच कहीं होती है।
एक तरफ़ रचनात्मक आज़ादी है,
दूसरी तरफ़ सामाजिक ज़िम्मेदारी।
भारत जैसे देश में, जहां एक ही सीन किसी के लिए कला हो सकता है और किसी के लिए चोट —
वहां सेंसरशिप से ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है समझदारी का संतुलन।
शायद आने वाले समय में बहस ये नहीं रहेगी कि “क्या काटा गया”,
बल्कि ये होगी कि “दर्शक को कितना समझदार माना गया”।
और उसी बहस के बीच ये सवाल हमेशा ज़िंदा रहेगा —
Censor Board के नियम कैसे काम करते हैं।
Hasan Babu
Founder, Bollywood Novel
सिनेमा को सिर्फ़ ख़बर नहीं, संदर्भ की तरह देखने की कोशिश।
जहां फ़िल्में सिर्फ़ रिलीज़ नहीं होतीं, समझी भी जाती हैं।




