Bollywood VFX Bidding System की सच्चाई सिर्फ़ पैसों की कहानी नहीं है,
बल्कि उस दौड़ की दास्तान है जहाँ सबसे सस्ती बोली जीतती है
और सबसे भारी क़ीमत कलाकार चुकाता है।
यह लेख बताता है कि कैसे race to the bottom,
अधूरी planning और दबाव भरे फैसले
Bollywood के VFX को अंदर से खोखला कर देते हैं।
📑 फ़हरिस्त
Bollywood में VFX की बात होते ही ज़्यादातर लोग टेक्नोलॉजी की तरफ़ उँगली उठाते हैं।
कहा जाता है कि हमारे पास Hollywood जैसे tools नहीं हैं,
या budgets उतने बड़े नहीं।
मगर ये आधी हक़ीक़त है।
असल कहानी वहाँ से शुरू होती है
जहाँ किसी फिल्म के लिए VFX का फैसला लिया जाता है।
जहाँ सवाल ये नहीं होता कि
“क्या सही लगेगा?”
बल्कि ये होता है —
“सबसे सस्ता कौन कर देगा?”
यहीं से जन्म लेती है
Bollywood VFX Bidding System की सच्चाई —
एक ऐसा सिस्टम जहाँ कला नहीं,
कीमत बोलती है।
ये लेख किसी एक कंपनी या किसी एक फिल्म पर इल्ज़ाम नहीं लगाता,
बल्कि उस पूरी व्यवस्था को सामने रखता है
जिसने धीरे-धीरे VFX को
एक creative department से ज़्यादा
cost-cutting exercise बना दिया है।

💰 Bidding System क्या होता है?
सीधे और सच्चे शब्दों में कहें तो
bidding system एक ऐसा तरीक़ा है
जिसमें VFX के काम के लिए
कई कंपनियों से दाम पूछे जाते हैं।
प्रोडक्शन हाउस कहता है —
“ये shots हैं, ये deadline है,
अब बताओ कितने में करोगे?”
एक कंपनी अपने हिसाब से
planning, manpower और समय जोड़कर
एक amount बताती है।
दूसरी कंपनी उससे कम।
तीसरी और नीचे।
और अक्सर,
सबसे नीचे जाने वाली बोली जीत जाती है।
यही वो मोड़ है
जहाँ quality और compromise
एक-दूसरे से टकराते हैं।
⚠️ Race to the Bottom: सबसे खामोश ज़हर
Industry के अंदर इसे एक नाम से जाना जाता है —
Race to the Bottom।
इस दौड़ में कोई ऊपर नहीं जाता,
सब नीचे आते हैं।
VFX company जानती है कि
इस budget में perfect काम नहीं होगा,
मगर “ना” कहने का मतलब है —
काम हाथ से निकल जाना।
तो बोली लगती है,
budget गिरता है,
timeline सिकुड़ती है,
और दबाव नीचे सरकता चला जाता है।
यही वो पल है
जहाँ Bollywood VFX Bidding System की सच्चाई
सबसे ज़्यादा बेरहम नज़र आती है।
🎭 VFX कंपनी की मजबूरी
अक्सर लोग समझते हैं कि
VFX companies जानबूझकर कम दाम बोलती हैं।
मगर तस्वीर इतनी सीधी नहीं है।
अगर एक कंपनी realistic budget बोले
और दूसरी undercut कर दे,
तो काम दूसरी को मिल जाता है।
इस डर में,
कंपनी compromise करती है —
planning पर,
time पर,
और आख़िर में
अपने ही artists पर।
ये मजबूरी किसी एक की नहीं,
पूरे सिस्टम की है।
🧠 VFX Artist पर सीधा असर
इस पूरे bidding खेल का
सबसे भारी असर पड़ता है
VFX artist पर।
Late nights,
unpaid overtime,
weekends का ग़ायब हो जाना —
ये सब धीरे-धीरे normal बना दिए जाते हैं।
Artist से कहा जाता है —
“बस निकाल दो”
और जब creativity को
सिर्फ़ deadline में कैद कर दिया जाए,
तो जादू कैसे बचे?
📑 फ़हरिस्त (आगे पढ़ें)
⚖️ Contracts और Legal Reality: जो लिखा नहीं, वही सबसे भारी पड़ता है
Bollywood के VFX bidding system की सबसे खामोश परत
contracts में छुपी होती है।
काग़ज़ पर सब कुछ साफ़-सुथरा लगता है —
shots की संख्या, delivery dates,
और payment milestones।
मगर असली कहानी वहाँ शुरू होती है
जहाँ बातें लिखी ही नहीं जातीं।
Revision limits vague रहती हैं,
creative changes की परिभाषा धुँधली होती है,
और emergency rework के लिए
कोई साफ़ clause नहीं होता।
नतीजा ये कि हर नया बदलाव
“minor adjustment” कहलाता है।
और वही minor adjustment
धीरे-धीरे major बोझ बन जाता है।
यही भी Bollywood VFX Bidding System की सच्चाई है —
जहाँ कानूनी अस्पष्टता
क्रिएटिविटी की सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है।

🔄 Revisions का अंतहीन चक्र: जहाँ ‘Final’ कभी final नहीं होता
Bidding system का एक और side-effect है —
endless revisions।
पहले कहा जाता है “final version”,
फिर आता है “बस थोड़ा सा tweak”,
फिर “director wants something else”,
और हर बार जो sentence दोहराया जाता है,
वो यही होता है —
“Budget तो वही रहेगा।”
Hollywood में revision limits
पहले से तय होती हैं।
Bollywood में revisions
artist की सहनशक्ति पर चलती हैं।
और सहनशक्ति का
कोई invoice नहीं बनता।
इस चक्र में quality धीरे-धीरे घिसती जाती है,
और जब release के बाद
VFX कमजोर लगता है,
तो blame नीचे की तरफ़ फिसल जाता है।

🧠 Producer का नज़रिया: Risk नीचे, Control ऊपर
Producer की मजबूरी को भी समझना ज़रूरी है।
Release date टल नहीं सकती,
star availability सीमित होती है,
और marketing पहले से चल रही होती है।
इस दबाव में producer सोचता है —
“VFX तो adjust हो ही जाएगा।”
और क्योंकि bidding system ने
VFX को पहले ही सबसे सस्ता बना दिया है,
risk भी उसी department पर डाल दिया जाता है।
ये सोच short-term में काम कर जाती है,
मगर long-term में
पूरी industry को खोखला कर देती है।
🗣️ Ground Reality: Anonymous Artist की आवाज़
एक senior VFX artist ने,
नाम न छापने की शर्त पर कहा:
“हम shots नहीं बनाते,
हम timelines से लड़ते हैं।
Client Hollywood जैसा output चाहता है,
लेकिन budget local ad से भी कम होता है।”
ये किसी एक इंसान की कहानी नहीं।
ये सैकड़ों artists की रोज़मर्रा की हक़ीक़त है।
जब system artist को सुनने से इंकार कर दे,
तो burnout सिर्फ़ वक़्त की बात रह जाता है।
🌍 Global Market बनाम Bollywood System: फर्क हुनर का नहीं, नियमों का है
एक दिलचस्प मगर कड़वी सच्चाई ये है कि
जिन भारतीय VFX studios को
Bollywood में “average” समझा जाता है,
वही studios जब international clients के साथ काम करते हैं,
तो उनका output world-class निकलता है।
Hollywood या global OTT projects में:
scope पहले से locked होता है,
revision limits तय होती हैं,
timeline realistic रखी जाती है,
और budget उसी हिसाब से allocate होता है।
वहाँ bidding system का मतलब
सबसे सस्ता नहीं,
बल्कि सबसे feasible और reliable option होता है।
यही वजह है कि
problem talent में नहीं,
problem local system में है।
और उस system की रीढ़ है —
Bollywood VFX Bidding System की सच्चाई।

📉 Quality गिरती है, मगर उँगली किस पर उठती है?
जब फिल्म release होती है
और VFX कमजोर लगता है,
तो audience सीधी बात कहती है —
“VFX खराब है।”
Industry के अंदर blame की दिशा
लगभग तय होती है:
VFX company,
VFX supervisor,
या सीधे VFX artist।
कोई ये नहीं पूछता कि:
क्या scope clear था?
क्या timeline इंसानी थी?
क्या budget realistic था?
Producer के फैसले,
contract की अस्पष्टता,
और bidding pressure —
ये सब discussion से बाहर रह जाते हैं।
यही imbalance
industry को सीखने नहीं देता,
और वही गलतियाँ
बार-बार दोहराई जाती हैं।
🪙 सस्ती बोली की महँगी क़ीमत
Cheapest bid का नुकसान
सिर्फ़ VFX तक सीमित नहीं रहता।
उसका असर पड़ता है:
film की credibility पर,
studio की reputation पर,
और सबसे ज़्यादा —
audience के भरोसे पर।
एक बार दर्शक को लग जाए कि
“यहाँ सब fake है”,
तो अगली बार उसे theatre तक लाना
कई गुना मुश्किल हो जाता है।
ये वो invisible cost है
जो Excel sheet में नहीं दिखती,
मगर box office पर ज़रूर दिख जाती है।
🌱 समाधान: Ideal बातें नहीं, काम की सच्चाई
Bidding system को overnight खत्म नहीं किया जा सकता।
मगर उसे ज़्यादा इंसानी ज़रूर बनाया जा सकता है।
कुछ practical और doable क़दम:
- 📌 Scope document पूरी तरह lock हो
- 📌 Revision limits पहले तय हों
- 📌 Timeline में buffer रखा जाए
- 📌 VFX supervisor को planning table पर जगह मिले
- 📌 Artist workload को human limits में रखा जाए
ये बातें idealistic नहीं हैं।
Hollywood और OTT platforms
सालों से इन्हीं rules पर काम कर रहे हैं।
अगर Bollywood भी
इनमें से आधा भी अपनाए,
तो output अपने आप बेहतर हो जाएगा।
🔗 SILO Connection: यह लेख क्यों ज़रूरी है
यह article अपने आप में complete है,
मगर इसका असली मक़सद
❓ FAQ: Bollywood VFX Bidding System को लेकर आम सवाल–जवाब
🎬 क्या Bollywood में VFX की हालत सच में bidding system की वजह से खराब होती है?
काफी हद तक, हाँ।
Bollywood में VFX की कमजोरी का बड़ा कारण
bidding system है,
जहाँ सबसे अच्छी planning नहीं,
बल्कि सबसे सस्ती बोली चुनी जाती है।
इससे time, quality और creativity
तीनों पर सीधा असर पड़ता है।
💰 क्या कम budget ही सबसे बड़ी परेशानी है?
कम budget एक factor हो सकता है,
लेकिन असली समस्या
priority की है।
जब VFX को खर्च समझा जाता है,
ना कि storytelling का अहम हिस्सा,
तो नतीजे compromise वाले ही आते हैं।
🧠 क्या भारतीय VFX artists में talent की कमी है?
बिल्कुल नहीं।
भारतीय VFX artists
Hollywood और international projects में
world-class काम कर रहे हैं।
Problem talent की नहीं,
system और process की है।
🔄 Revisions पर control क्यों ज़रूरी है?
क्योंकि unlimited revisions
artist को burnout की तरफ़ ले जाते हैं।
जब revision limits clear होती हैं,
तो planning बेहतर होती है
और output भी ज़्यादा focused निकलता है।
🌱 क्या Bollywood का VFX system सुधर सकता है?
हाँ, बिल्कुल।
अगर scope clear हो,
timeline realistic हो,
और bidding system को
ज़्यादा इंसानी बनाया जाए,
तो बदलाव मुमकिन है।

📝 आख़िरी बात
Bollywood VFX Bidding System की सच्चाई
ये नहीं है कि इस industry में लोग बुरे हैं,
या हुनर की कमी है।
सच्चाई ये है कि
एक ऐसा सिस्टम बन गया है
जहाँ कीमत, कला से आगे निकल जाती है,
और इंसान, timeline के नीचे दब जाता है।
जब bidding system में
clarity नहीं होती,
तो confusion पैदा होता है।
जब clarity नहीं होती,
तो creativity मर जाती है।
जिस दिन Bollywood ने ये समझ लिया कि
VFX कोई आख़िरी वक़्त का jugाड़ नहीं,
बल्कि planning से शुरू होने वाली कला है —
उस दिन comparison अपने आप खत्म हो जाएगा।
क्योंकि हुनर यहाँ कभी कम नहीं था,
बस उसे सस्ता बना दिया गया था।
और सस्ता हुनर,
कभी अमर सिनेमा नहीं रच सकता।




