बॉलीवुड में पुराने गानों का रीमेक अचानक पैदा हुआ ट्रेंड नहीं है। इसके पीछे nostalgia, डर, बिज़नेस और algorithm का ऐसा खेल है, जिसे आम दर्शक सिर्फ़ सुनता है — समझ नहीं पाता। ये आर्टिकल उसी खेल की परतें खोलता है।
🎼 बॉलीवुड में पुराने गानों का रीमेक आज किसी इत्तेफ़ाक़ का नतीजा नहीं है। ये एक सोची-समझी चाल है, जो चुपचाप आई, धीरे-धीरे फैलती गई और अब इंडस्ट्री की रगों में दौड़ रही है। जब आप किसी फिल्म का नया गाना सुनते हैं और अचानक दिल कहता है कि “ये तो पहले भी सुना हुआ लगता है”, तो समझ लीजिए — आप एक बिज़नेस फ़ैसले का सामना कर रहे हैं।
आज का बॉलीवुड रिस्क से डरता है। और जहाँ डर होता है, वहाँ यादों का सहारा लिया जाता है। पुराने गाने, जो पहले ही जनता के ज़ेहन में जगह बना चुके हैं, अब नए चेहरों, नए beats और नए पैकेज में फिर से परोसे जा रहे हैं। सवाल ये नहीं कि ये गाने अच्छे हैं या बुरे — सवाल ये है कि ये बनाए ही क्यों जा रहे हैं?
इस सवाल का जवाब जज़्बात में नहीं, बल्कि हिसाब-किताब में छुपा है।
📑 फ़हरिस्त
- 🎧 जब गाना सिर्फ़ गाना नहीं रहता
- 🎵 तीन गाने, एक ही कहानी
- 💰 प्रोड्यूसर का डर और म्यूज़िक कंपनी की चाल
- 🤝 अंदर की डील, जो जनता को नहीं दिखती
- 🧠 नॉस्टैल्जिया: सबसे सस्ता मार्केटिंग टूल
- 📝 आख़िरी बात
- ❓ FAQ
🎧 जब गाना सिर्फ़ गाना नहीं रहता
एक वक़्त था जब गाना फिल्म की रूह हुआ करता था। गीतकार की कलम से निकले अल्फ़ाज़, संगीतकार की तान और गायक की आवाज़ — तीनों मिलकर एक एहसास पैदा करते थे। मगर आज के दौर में गाना एक प्रोडक्ट है।

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बॉलीवुड में पुराने गानों का रीमेक इसी प्रोडक्ट-कल्चर की सबसे साफ़ मिसाल है। आज का प्रोड्यूसर सबसे पहले ये नहीं पूछता कि गाना कहानी को क्या दे रहा है, बल्कि ये देखता है:
- • Reel बनेगा या नहीं
- • Instagram पर चलेगा या नहीं
- • YouTube पर पहले हफ्ते में numbers आएँगे या नहीं
यहीं से पुराने गानों की वापसी शुरू होती है — क्योंकि वो पहले ही इन तीनों इम्तिहानों में पास हो चुके होते हैं।
🎵 तीन गाने, तीन मिसालें — एक ही कहानी
अगर आप बीते कुछ सालों के गानों पर नज़र डालें, तो पाएँगे कि कई धुनें आपको अचानक अतीत में ले जाती हैं। वजह साफ़ है — वो अतीत से ही उठाई गई हैं।
संदेशे आते हैं… हमें तड़पाते हैं।
ना तो कारवाँ की तलाश है।
सात समुंदर पार में तेरे पीछे पीछे आ गई।
इन तीनों गानों की एक साझा सच्चाई है — ये अपने दौर में पहले ही सुपरहिट रह चुके थे। जब इन्हें दोबारा इस्तेमाल किया गया, तो किसी ने ये रिस्क नहीं लिया कि जनता पसंद करेगी या नहीं। जनता तो इन्हें कब का अपना बना चुकी थी।
यानी:
- • गारंटी वाला इमोशन
- • Ready-made पहचान
- • Zero introduction cost
और यही चीज़ किसी भी प्रोड्यूसर को सबसे ज़्यादा लुभाती है।
💰 प्रोड्यूसर का डर और म्यूज़िक कंपनी की चाल
एक नया गाना बनाना आसान काम नहीं है। उसमें वक़्त लगता है, पैसा लगता है और सबसे बड़ी बात — कोई भरोसा नहीं होता कि वो चलेगा भी या नहीं।

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आज का प्रोड्यूसर ये रिस्क नहीं लेना चाहता। क्योंकि अगर फिल्म रिलीज़ से पहले ही गाना नहीं चला, तो सोशल मीडिया उसे वहीं दफ़ना देता है।
यहीं पर म्यूज़िक कंपनी खेल में उतरती है।
म्यूज़िक कंपनियों के पास क्या है?
- • पुराने हिट गानों का खज़ाना
- • हमेशा बिकने वाली यादें
- • हर दशक में दोबारा इस्तेमाल की ताक़त
और यहीं से वो डील शुरू होती है, जिसे आम दर्शक कभी नहीं देख पाता।
🤝 अंदर की डील, जो जनता को नहीं दिखती
बॉलीवुड में ज़्यादातर सौदे काग़ज़ों पर नहीं, बातचीत में तय होते हैं। बाहर से लगता है कि प्रोड्यूसर ने पुराने गाने के राइट्स ख़रीदे होंगे, लेकिन असल खेल इससे कहीं ज़्यादा पेचीदा होता है।
अक्सर बातचीत कुछ यूँ होती है:
“तुम अपना वो पुराना सुपरहिट गाना मुझे दे दो। बदले में मैं अपनी फिल्म के सारे नए गानों के राइट्स तुम्हें दे देता हूँ। पैसा इधर-उधर नहीं जाएगा, बस हिस्सेदारी बदल जाएगी।”
इस सौदे में:
- • प्रोड्यूसर को मिलता है ready-made hit
- • म्यूज़िक कंपनी को मिल जाता है पूरी फिल्म का कैटलॉग
- • Cash कम लगता है, Control ज़्यादा मिलता है
यानी दोनों खुश। पैसा कौन देगा?
वो तो जनता देगी — टिकट ख़रीदकर, views देकर, reels बनाकर।
🧠 नॉस्टैल्जिया: सबसे सस्ता और ताक़तवर मार्केटिंग टूल
इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी उसकी यादें होती हैं। जो चीज़ हमें हमारे बीते हुए कल से जोड़ती है, उस पर हम बिना सोचे भरोसा कर लेते हैं।
बॉलीवुड में पुराने गानों का रीमेक इसी psychology पर चलता है। जब कोई जाना-पहचाना मुखड़ा बजता है:
- • हम skip नहीं करते
- • हम compare करते हैं
- • हम बहस करते हैं
- • और वही बहस promotion बन जाती है
नॉस्टैल्जिया का सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि उसे बेचना नहीं पड़ता — वो खुद बिक जाता है।
📲 सोशल मीडिया और Algorithm का अदृश्य दबाव
आज का गाना सिर्फ़ इंसानों के लिए नहीं बनता, बल्कि algorithm के लिए भी बनाया जाता है। Platforms को चाहिए:
- • Familiar sound
- • High retention
- • Instant पहचान
पुराने गानों का रीमेक इन तीनों कसौटियों पर खरा उतरता है। Algorithm को इस बात से कोई सरोकार नहीं कि गाना original है या recycled। उसे सिर्फ़ numbers दिखते हैं।
और numbers ने ही इस ट्रेंड को पाल-पोस कर बड़ा किया है।
🎼 नए Composers के लिए बंद होते दरवाज़े
एक नए संगीतकार की हालत आज कुछ वैसी है जैसे किसी ऐसे शायर की, जिसे मुशायरे में बुलाया तो जाता है, लेकिन पढ़ने नहीं दिया जाता।

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अक्सर होता ये है:
- • नया tune बनता है
- • demo जाता है
- • जवाब आता है — “अच्छा है, मगर risky है”
और फिर वही पुराना हिट गाना उठाकर, उस पर नया arrangement चढ़ा दिया जाता है।
कड़वी सच्चाई:
नया composer = experiment
पुराना गाना = insurance policy
🎤 Singer की पहचान कैसे धुंधली हुई
एक वक़्त था जब आवाज़ सुनते ही नाम ज़ेहन में आ जाता था। आज आवाज़ें interchangeable हो गई हैं।
रीमेक के दौर में:
- • Original singer की soul गायब
- • नया singer सिर्फ़ delivery boy
- • Emotion पहले से तय
जब गाना पहले ही मशहूर हो, तो गायक का काम सिर्फ़ उसे दोहराना रह जाता है। वो आवाज़ नहीं रचता, वो बस आवाज़ निभाता है।
👥 Audience भी मासूम नहीं है
ये बात कड़वी है, लेकिन ज़रूरी है — इस खेल में दर्शक भी पूरी तरह बेगुनाह नहीं है।

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हम क्या करते हैं?
- • नया गाना आए — skip
- • पुराना मुखड़ा आए — play
- • nostalgia को reward
- • originality को ignore
फिर शिकायत करते हैं कि “आजकल अच्छे गाने नहीं बनते।”
सवाल सीधा है:
अगर हम सुनेंगे ही वही जो पहले सुना हुआ है, तो नया कैसे पनपेगा?
🔮 क्या ये ट्रेंड कभी टूटेगा?
ये सवाल आज हर उस शख़्स के ज़ेहन में है, जो संगीत से मोहब्बत करता है। क्या बॉलीवुड में पुराने गानों का रीमेक हमेशा चलता रहेगा? क्या इंडस्ट्री कभी फिर से नई धुनों पर भरोसा करेगी?

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इतिहास कहता है कि कोई भी ट्रेंड हमेशा नहीं चलता। हर फ़ॉर्मूला एक वक़्त के बाद थक जाता है। जब हर दूसरी फिल्म में वही जाना-पहचाना मुखड़ा सुनाई देने लगे, तो नॉस्टैल्जिया भी बोझ बन जाता है।
जिस दिन audience ये कहने लगे:
“हमने ये पहले सुन लिया है, अब कुछ नया सुनाओ।”
उसी दिन इस ट्रेंड की नींव हिलने लगेगी।
⚠️ Saturation Point: जब यादें भी उबाने लगें
आज हालात ये हैं कि:
- • हर दूसरी फिल्म में रीमेक गाना
- • हर तीसरी Reel में वही धुन
- • हर प्लेटफॉर्म पर एक ही एहसास की recycling
ये स्थिति ज़्यादा दिन तक टिक नहीं सकती। क्योंकि audience भले nostalgia से प्यार करती हो, लेकिन उसे बार-बार परोसा जाए तो वही चीज़ बेस्वाद लगने लगती है।
जब:
- • फर्क महसूस होना बंद हो जाए
- • रीमेक भी copy लगे
- • इमोशन artificial महसूस हो
तब audience खुद मुँह मोड़ लेती है।
🎬 एक फिल्म, जो गेम बदल सकती है
हर ट्रेंड को तोड़ने के लिए एक उदाहरण काफ़ी होता है। अगर कोई बड़ी फिल्म:
- • बिना किसी रीमेक गाने के
- • पूरी तरह नई धुनों के साथ
- • सिर्फ़ कंटेंट के दम पर
हिट हो जाती है, तो इंडस्ट्री की सोच बदलने में देर नहीं लगती।
प्रोड्यूसर जोखिम से नहीं डरते, वो नुक़सान से डरते हैं। जिस दिन उन्हें दिखेगा कि नया भी बिक सकता है, उसी दिन पुरानी आदतें टूटने लगेंगी।
🌱 Independent Music: उम्मीद की किरण
इस पूरी अँधेरी तस्वीर में एक रौशनी भी है, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है — independent music।
बिना बड़े बैनर, बिना भारी प्रमोशन और बिना किसी पुराने सहारे के, कई नए कलाकार सिर्फ़ अपनी आवाज़ और सच्चाई के दम पर जगह बना रहे हैं।
ये कलाकार याद दिलाते हैं कि:
- • अच्छा संगीत आज भी चलता है
- • नई धुन भी दिल को छू सकती है
- • Audience पूरी तरह खत्म नहीं हुई
मगर सवाल ये है — क्या बॉलीवुड इन्हें अपनाने को तैयार है?
🧨 इंडस्ट्री का डर: Fail होने का ख़ौफ़
बॉलीवुड की सबसे बड़ी बीमारी है — डर। असफल होने का डर, पैसा डूबने का डर, relevance खोने का डर।
और यही डर बॉलीवुड में पुराने गानों का रीमेक जैसे ट्रेंड को ज़िंदा रखता है।

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जब तक डर हावी रहेगा, तब तक:
- • पुराने गाने safe option रहेंगे
- • नए कलाकार waitlist में रहेंगे
- • originality compromise होती रहेगी
ये एक vicious circle है, जिससे निकलने के लिए सिर्फ़ हिम्मत नहीं, नियत भी चाहिए।
🔥 Bold Reality Check: सच जो कोई खुलकर नहीं कहता
अब बात घुमा-फिराकर करने का वक़्त नहीं है। अगर ईमानदारी से देखा जाए, तो बॉलीवुड में पुराने गानों का रीमेक एक सुविधा है — मजबूरी नहीं।
इंडस्ट्री इसे ऐसे पेश करती है जैसे इसके बिना काम ही नहीं चल सकता, लेकिन हक़ीक़त ये है कि ये रास्ता चुना गया है क्योंकि ये आसान है।
साफ़ और कड़वी सच्चाइयाँ:
- • रीमेक शॉर्टकट है, समाधान नहीं
- • नॉस्टैल्जिया सहारा है, भविष्य नहीं
- • Familiarity बिकती है, मगर सीमित वक़्त तक
- • Creativity दबेगी तो एक दिन फटेगी
आज भले ये मॉडल मुनाफ़ा दे रहा हो, मगर कल यही मॉडल इंडस्ट्री की सबसे बड़ी कमज़ोरी बन सकता है।
🧠 Psychological Trap: हम क्यों फँस जाते हैं?
इंसान नई चीज़ों से ज़्यादा उन चीज़ों पर भरोसा करता है, जिन्हें वो पहले से जानता है। यही वजह है कि जब कोई जाना-पहचाना मुखड़ा बजता है, तो दिमाग़ उसे safe मान लेता है।
रीमेक गाने इसी psychological trap पर चलते हैं:
- • दिमाग़ कहता है — “ये जाना-पहचाना है”
- • दिल कहता है — “इसे सुन लेते हैं”
- • और algorithm कहता है — “इसे push करो”
इस तरह एक औसत गाना भी सिर्फ़ अपनी पहचान की वजह से बड़ा बन जाता है।
🎯 Music बनाम Noise: फ़र्क़ धुंधला कैसे हुआ?
आज गाने बन नहीं रहे, manufacture हो रहे हैं। Emotion पहले तय होता है, फिर उस पर beat चढ़ाई जाती है।

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रीमेक के दौर में:
- • संगीत महसूस नहीं किया जाता
- • संगीत इस्तेमाल किया जाता है
- • गाना कहानी नहीं बढ़ाता, marketing बढ़ाता है
और यहीं पर music और noise के बीच का फ़र्क़ धुंधला हो जाता है।
🚨 अगर यही चलता रहा तो आगे क्या?
अगर इंडस्ट्री इसी रास्ते पर चलती रही, तो आने वाले सालों में हालात कुछ ऐसे हो सकते हैं:
- • हर नया गाना पुराने जैसा लगेगा
- • नई आवाज़ों की पहचान खत्म होती जाएगी
- • याद रहने वाले गाने कम होते जाएँगे
- • और संगीत background noise बन जाएगा
ये भविष्य किसी को भी रास नहीं आएगा — न कलाकार को, न दर्शक को, और आख़िरकार न इंडस्ट्री को।
💡 रास्ता क्या है? (Hopeful लेकिन Practical)
हल मौजूद है, मगर आसान नहीं।

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अगर बॉलीवुड सच में बदलाव चाहता है, तो उसे:
- • नए composers पर भरोसा करना होगा
- • singers को पहचान बनाने का वक़्त देना होगा
- • हर फिल्म को nostalgia के सहारे नहीं छोड़ना होगा
- • और audience को भी थोड़ा धैर्य दिखाना होगा
बदलाव एक दिन में नहीं आएगा, मगर आएगा तभी जब कोई पहला क़दम उठाएगा।
📑 फ़हरिस्त (पूरा आर्टिकल)
- 🎧 जब गाना सिर्फ़ गाना नहीं रहता
- 🎵 तीन गाने, तीन मिसालें — एक ही कहानी
- 💰 प्रोड्यूसर का डर और म्यूज़िक कंपनी की चाल
- 🤝 अंदर की डील, जो जनता को नहीं दिखती
- 🧠 नॉस्टैल्जिया: सबसे सस्ता मार्केटिंग टूल
- 📲 सोशल मीडिया और Algorithm का दबाव
- 🔮 क्या ये ट्रेंड कभी टूटेगा?
- 🔥 Bold Reality Check
- 📝 आख़िरी बात
- ❓ FAQ
📝 आख़िरी बात
बॉलीवुड में पुराने गानों का रीमेक कोई अकेला ट्रेंड नहीं है। ये उस डर का आईना है, जिसमें पूरी इंडस्ट्री अपना अक्स देखती है। डर — असफल होने का, पैसा डूबने का, relevance खो देने का।
पुराने गानों का सहारा लेना आसान है, क्योंकि वहाँ पहले से तालियाँ रखी होती हैं। मगर सवाल ये है कि क्या हम हमेशा उधार की तालियों पर ज़िंदा रह सकते हैं?
संगीत का काम सिर्फ़ याद दिलाना नहीं होता — उसका काम नए एहसास पैदा करना भी होता है। जब गाने सिर्फ़ algorithm के लिए बनने लगें, तो वो दिल तक पहुँचने से पहले ही थक जाते हैं।
अगर बॉलीवुड को सच में आगे बढ़ना है, तो उसे एक दिन ये हिम्मत दिखानी ही पड़ेगी कि वो बिना nostalgia की बैसाखी के भी चल सकता है।
वरना आने वाली पीढ़ी के पास सुनने के लिए ढेर सारे गाने होंगे…
मगर याद रखने के लिए शायद एक भी नहीं।
❓ FAQ: बॉलीवुड में पुराने गानों का रीमेक
🎶 बॉलीवुड में पुराने गानों का रीमेक क्यों बनाया जाता है?
क्योंकि पुराने गाने पहले से लोगों के ज़ेहन में बसे होते हैं। प्रोड्यूसर के लिए ये कम रिस्क और ज़्यादा भरोसे वाला सौदा होता है।
💰 क्या रीमेक गाने सस्ते पड़ते हैं?
अक्सर हाँ। नए गाने बनाने में समय और पैसा दोनों लगता है, जबकि पुराने गानों में nostalgia पहले से मौजूद होता है और कई बार rights exchange के ज़रिये खर्च कम हो जाता है।
🎼 क्या इससे नए संगीतकारों को नुकसान होता है?
काफ़ी हद तक। जब इंडस्ट्री safe options पर टिक जाती है, तो नए composers और singers को मौके कम मिलने लगते हैं।
📲 सोशल मीडिया और algorithm का इसमें क्या रोल है?
Algorithm familiar sounds को ज़्यादा push करता है। पुराने गानों का रीमेक जल्दी पहचान बना लेता है, इसलिए platforms पर तेज़ी से फैलता है।
🔮 क्या ये ट्रेंड कभी खत्म होगा?
हर ट्रेंड का एक saturation point होता है। जिस दिन audience को रीमेक उबाऊ लगने लगेंगे, उसी दिन इंडस्ट्री को मजबूरी में नया रास्ता चुनना पड़ेगा।
🧠 Audience की इसमें कितनी ज़िम्मेदारी है?
काफ़ी ज़्यादा। जब दर्शक बार-बार पुराने गानों को ही reward करता है, तो इंडस्ट्री वही परोसती है। बदलाव दोनों तरफ़ से आता है।
✍️ Hasan Babu
Founder, Bollywood Novel
जहाँ सिनेमा, संगीत और इंडस्ट्री के अनकहे सच
बिना शोर, बिना डर — सीधे दिल और दिमाग़ तक पहुँचते हैं।
यहाँ यादें भी बिकती हैं, और सवाल भी पूछे जाते हैं।




