Excerpt:
पुरानी फिल्में और बचपन का रिश्ता सिर्फ़ यादों का नहीं, एहसासों का है। हेरा फेरी, बाहुबली, मुन्ना भाई, रामायण और मोगली के साथ बड़ा होना एक पूरी पीढ़ी की कहानी है, जो आज भी दिल में ज़िंदा है।
कभी-कभी यूँ लगता है जैसे सब कुछ कल ही की बात हो। कल ही तो हम टीवी के सामने ज़मीन पर बैठकर फिल्में देखते थे, कल ही तो वीडियो कैसेट आगे-पीछे करते थे, कल ही तो रविवार का मतलब होता था — “आज फिल्म लगेगी।”
लेकिन जब ठहरकर सोचते हैं, तो एहसास होता है कि पुरानी फिल्में और बचपन अब सिर्फ़ यादों की अलमारी में रखी चीज़ नहीं रहीं, बल्कि वो आईना बन चुकी हैं जिसमें हम अपनी उम्र, अपना वक्त और अपनी ज़िंदगी देख लेते हैं।
हेरा फेरी का अगला पार्ट आने वाला है, लेकिन उसका पहला पार्ट पच्चीस साल पहले आया था। बाहुबली को रिलीज़ हुए दस साल हो चुके हैं। 3 इडियट्स का रेंचो सोलह साल पहले ग्रेजुएट हो चुका है। मुन्ना भाई को MBBS की डिग्री लिए इक्कीस साल बीत चुके हैं। धमाल के चंपुओं को W ढूँढते हुए सत्रह साल गुजर गए।
जब ये सब गिनती में आता है, तब समझ आता है कि ये कोई फिल्मी फैक्ट नहीं, बल्कि हमारी ज़िंदगी की टाइमलाइन है।
📑 फ़हरिस्त
😂 हेरा फेरी और हँसी का सुनहरा दौर

हेरा फेरी सिर्फ़ एक कॉमेडी फिल्म नहीं थी, वो एक दौर था। बाबू भैया, राजू और श्याम ऐसे किरदार थे जो हमें अपने जैसे लगते थे। उनकी परेशानी हमारी लगती थी और उनकी हँसी में हम अपनी बेफिक्री ढूंढ लेते थे।
फोन उठाकर कहना — “ये बाबू राव का स्टाइल है” — एक डायलॉग नहीं, बल्कि एक आदत बन गया था। उस दौर में हँसना आसान था, क्योंकि ज़िंदगी में EMI नहीं थी, नोटिफिकेशन नहीं थे और तुलना करने वाला सोशल मीडिया नहीं था।
यही वजह है कि पुरानी फिल्में और बचपन आज भी हमें उतना ही सुकून देते हैं, जितना उस वक्त दिया करते थे।
🤣 धमाल, वेलकम और फैमिली कॉमेडी का ज़माना

धमाल के चार दोस्त जब W ढूँढने निकलते थे, तो असल में वो हमें ये सिखा रहे होते थे कि बेवकूफी में भी एक मासूम खुशी होती है। वहीं वेलकम के उदय भाई और मजनू भाई ने कॉमेडी को एक अलग ही मुकाम पर पहुँचा दिया।
ये वो फिल्में थीं जिन्हें पूरा परिवार साथ बैठकर देख सकता था। दादी हँसती थीं, बच्चे तालियाँ बजाते थे और माँ-बाप चैन की साँस लेते थे कि कम से कम ये फिल्म घर के माहौल को खराब नहीं करेगी।
आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में ऐसी फैमिली कॉमेडी ढूँढना मुश्किल हो गया है। शायद इसलिए भी हम बार-बार पुरानी फिल्मों की तरफ लौटते हैं।
🎓 रेंचो और मुन्ना भाई की सीख

3 इडियट्स के रेंचो ने हमें ये सिखाया कि डिग्री से ज़्यादा ज़रूरी है काबिल बनना। वहीं मुन्ना भाई ने डॉक्टर होने का मतलब बताया — इंसानियत।
आज सोचो, रेंचो को ग्रेजुएट हुए सोलह साल बीत चुके हैं, लेकिन उसका कहा हर जुमला आज भी उतना ही ज़िंदा है। यही तो ताक़त है उस सिनेमा की, जिसमें सीख भी थी और सच्चाई भी।
👻 जब डर भी मीठा लगता था

भूल भुलैया की मंजूलिका डराती ज़रूर थी, लेकिन डर तब भी मज़ेदार था, क्योंकि माँ पास बैठी होती थी। उस डर में भी एक सुरक्षा का एहसास था, जो आज के हॉरर सिनेमा में कम देखने को मिलता है।
🛕 रामायण, महाभारत और बचपन
थोड़ा और पीछे जाओगे तो रामायण को अड़तीस साल गुजर चुके हैं और महाभारत को सैंतीस साल। मोगली को चड्ढी में घूमते हुए भी छत्तीस साल बीत चुके हैं।
तब रविवार की सुबह मंदिर की घंटी और रामायण एक साथ शुरू होते थे। वो सिर्फ़ सीरियल नहीं थे, वो हमारे संस्कारों की नींव थे।
🧠 फिल्मों ने हमारे बचपन को कैसे गढ़ा
इन फिल्मों और सीरियल्स ने हमें रिश्तों की अहमियत, अच्छाई की ताक़त और सब्र का मतलब सिखाया। शायद इसलिए आज भी हम उन्हें भूल नहीं पाते।
🎶 गाने, डायलॉग और आवाज़ें जो आज भी बचपन जगा देती हैं
पुरानी फिल्मों के गाने सिर्फ़ मनोरंजन नहीं थे, वो हमारी ज़िंदगी का बैकग्राउंड म्यूज़िक हुआ करते थे। रेडियो पर बजता कोई गीत, कैसेट को पेंसिल से ठीक करना और सोते-सोते भी गुनगुनाते रहना — ये सब हमारे बचपन की मामूली लेकिन अनमोल आदतें थीं।
तब गानों में जल्दी नहीं होती थी। लफ़्ज़ों को वक़्त दिया जाता था, धुनों को साँस लेने दी जाती थी। शायद इसलिए आज भी जब वो गाने बजते हैं, तो दिल बिना पूछे उसी दौर में लौट जाता है। यही तो ताक़त है पुरानी फिल्में और बचपन की — आवाज़ के ज़रिए यादों को ज़िंदा कर देना।
आज गाने ट्रेंड बनकर आते हैं और कुछ ही हफ्तों में गायब हो जाते हैं, लेकिन पुराने गीत आज भी वैसे ही खड़े हैं — बिल्कुल हमारे बचपन की तरह, बिना बदले हुए।
⏳ नॉस्टेल्जिया क्यों इतना गहरा असर छोड़ता है?
नॉस्टेल्जिया सिर्फ़ याद करना नहीं होता, वो एक तरह का सुकून होता है। जब आज की ज़िंदगी तेज़, थकी हुई और उलझी हुई लगती है, तब दिमाग़ अपने-आप पीछे की तरफ़ भागता है — उस दौर में जहाँ सब कुछ आसान था।
बचपन में हमारे पास ज़्यादा चीज़ें नहीं थीं, लेकिन शिकायतें भी नहीं थीं। आज सब कुछ है, लेकिन दिल अक्सर खाली-सा लगता है। शायद इसलिए पुरानी फिल्में और बचपन हमें ज़्यादा सच्चे और अपने लगते हैं।
ये यादें हमें याद दिलाती हैं कि हम कभी बिना डर के हँसते थे, बिना वजह खुश हो जाते थे। और यही एहसास नॉस्टेल्जिया को इतना ताक़तवर बना देता है।
📱 आज की फिल्में और कल की यादें
आज की फिल्मों में टेक्नोलॉजी बेहतर है, बजट बड़ा है और स्क्रीन ज़्यादा चमकदार है। लेकिन अक्सर वो दिल को छू नहीं पातीं। इसके उलट, पुरानी फिल्में साधारण थीं, लेकिन उनमें सच्चाई थी।
आज की कहानियाँ जल्दी खत्म हो जाती हैं, लेकिन पुरानी फिल्मों के सीन आज भी याद रहते हैं। शायद इसलिए क्योंकि तब फिल्में बनाई नहीं जाती थीं, महसूस की जाती थीं।
इसका मतलब ये नहीं कि आज सब कुछ खराब है, लेकिन ये ज़रूर सच है कि जो जुड़ाव पुरानी फिल्में और बचपन में था, वो आज कम देखने को मिलता है।
👨👩👧👦 परिवार, मोहल्ला और साथ बैठकर फिल्म देखना
एक वक़्त था जब पूरा मोहल्ला एक ही फिल्म देखता था। अगले दिन उसी पर चर्चा होती थी। स्कूल, गली और घर — हर जगह वही डायलॉग दोहराए जाते थे।
आज हर किसी के हाथ में अलग स्क्रीन है। फिल्में अकेले देखी जाती हैं और यादें भी अकेले बनती हैं। शायद इसलिए वो ज़्यादा देर तक टिकती नहीं।
बचपन की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि खुशियाँ बाँटी जाती थीं। और फिल्मों ने हमें ये बाँटना सिखाया।
🕰️ हम बूढ़े नहीं हो रहे, बस आगे बढ़ रहे हैं
जब हम कहते हैं कि फलाँ फिल्म को इतने साल हो गए, तो अक्सर हँसी आ जाती है। लेकिन अंदर कहीं हल्की-सी कसक भी होती है। क्योंकि हर साल के साथ हम अपने बचपन से थोड़ा और दूर होते जाते हैं।
लेकिन सच्चाई ये है कि बचपन कहीं जाता नहीं। वो हमारी यादों में, हमारी पसंद में और हमारी बातों में ज़िंदा रहता है। यही वजह है कि पुरानी फिल्में देखते वक़्त हम फिर से वही इंसान बन जाते हैं, जो कभी थे।
❤️ आख़िरी बात, दिल से
और जबकि महसूस ऐसा होता है कि ये सब कल की बातें हैं, जब कि सोचो तो इन सब बातों को एक पूरा ज़माना गुजर गया है।
तो बिना इधर-उधर की बातें किए, मेरे कहने का मतलब बस इतना-सा है —
हाँ, हम धीरे-धीरे बड़े हो रहे हैं।
लेकिन आपके बचपन की शुरुआत इन सब में से किसके साथ हुई थी —
ये सवाल आज भी उतना ही ज़िंदा है।
कमेंट में ज़रूर बताइए, क्योंकि आपकी याद किसी और के दिल की आवाज़ बन सकती है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
पुरानी फिल्में आज भी लोगों को क्यों पसंद आती हैं?
क्योंकि उनमें बनावट कम और एहसास ज़्यादा होते थे। वो दिल से बनाई जाती थीं।
क्या नॉस्टेल्जिया अच्छी चीज़ है?
हाँ, सही मात्रा में नॉस्टेल्जिया इंसान को भावनात्मक सुकून देता है।
क्या आज की फिल्में खराब हैं?
नहीं, लेकिन उनका जुड़ाव और असर अलग है।
क्या बच्चों को पुरानी फिल्में दिखानी चाहिए?
ज़रूर, क्योंकि उनसे रिश्तों, सब्र और इंसानियत की सीख मिलती है।




