आज किसी फिल्म का टीज़र आने से पहले ही उसका पोस्टर सोशल मीडिया पर तैरने लगता है। हर हाथ में स्क्रीन है और हर सेकंड प्रमोशन चल रहा है।
लेकिन उस दौर की सोचिए जब न स्मार्टफोन था, न यूट्यूब और न ही इंस्टाग्राम। तब 90s Bollywood Film Promotion का पूरा खेल डिजिटल एल्गोरिदम से नहीं, बल्कि लोगों के बीच धीरे-धीरे बनती फिल्म की चर्चा से चलता था।
उस ज़माने में किसी फिल्म का आना कोई एक दिन का इवेंट नहीं होता था। वह हफ्तों तक लोगों की बातचीत, चाय की चुस्कियों और गलियों की दीवारों पर धीरे-धीरे पकने वाला एक पूरा सामाजिक उत्सव था।
🔥 मुख़्तसर:
- बिना इंटरनेट का सिनेमा, 90s में फिल्मों का प्रचार पोस्टर, अख़बार, रेडियो और टीवी जैसे माध्यमों से होता था।
- पोस्टर और अख़बार की ताक़त, नई फिल्म की ख़बर लोगों तक पहुंचाने में इनका बड़ा हिस्सा था।
- ऑडियो कैसेट का जादू, रिलीज़ से पहले जुबान पर चढ़े गाने फिल्म की पहचान बना देते थे।
- माउथ पब्लिसिटी का असर, पहले शो के बाद दर्शकों की राय फिल्म की आगे की चर्चा को दिशा देती थी।
📑 फ़हरिस्त (इस लेख में आगे क्या है)
दीवारों पर छपी पहली ख़बर
उस दौर में किसी नई फिल्म की पहली आहट शहर की चारदीवारी देती थी। सुबह स्कूल या दफ्तर निकलते वक्त जब चौराहे की दीवार पर कोई नया रंग दिखता, तो कदम अपने आप रुक जाते थे।
रात के वक्त जब शहर सो रहा होता, तब पोस्टर लगाने वाली टीमें काम पर निकलती थीं। सुबह राहगीरों को किसी दीवार पर सितारे की बड़ी तस्वीर और चमकीले अक्षरों में फिल्म का नाम नज़र आता।
उन पोस्टरों पर छपे बड़े-बड़े बोल्ड लेटर्स और पेंटिंग जैसी दिखने वाली छवियां सिर्फ आर्ट नहीं थीं। वे सड़क चलते हर आम इंसान का ध्यान खींचने का सबसे सीधा जरिया थीं।
शहरों में ऑटो-रिक्शा के पीछे, लोकल बसों के किनारों और तांगों पर लगे छोटे स्टीकर्स चलते-फिरते विज्ञापनों का काम करते थे। लोग रास्ते में इन्हें देखते और फिल्म का नाम उनकी याद में दर्ज हो जाता।
सिनेमाघरों के ऊपर लगने वाले हाथ से रंगे विशाल कटआउट्स दूर से ही बता देते थे कि इस शुक्रवार पर्दे पर कुछ बड़ा उतरने वाला है। इन कटआउट्स का मकसद दर्शकों को थिएटर की तरफ खींचना और एक बड़ा विजुअल इम्पैक्ट बनाना था।
दीवार का वह पोस्टर कोई सादा कागज़ नहीं, बल्कि पूरे इलाके को यह बताने का तरीका हुआ करता था कि एक नई फिल्म आने वाली है।
अख़बार और मैगज़ीन का जादू
फिल्मों के शौकीन लोगों के लिए अखबारों के एंटरटेनमेंट पन्ने नई फिल्मों की जानकारी पाने का एक अहम जरिया थे। वहां छपे विज्ञापनों से लोगों को आने वाली फिल्मों के बारे में पता चलता था।

उस विज्ञापन में रिलीज़ की तारीख, थिएटर्स के नाम और शो की टाइमिंग्स दर्ज होती थीं। परिवार में बैठकर तय होता था कि किस थिएटर का कौन-सा शो देखने जाना है।
दूसरी तरफ मायापुरी, स्क्रीन और स्टारडस्ट जैसी फिल्मी पत्रिकाएं प्रचार को घर की बैठक तक पहुंचा देती थीं। नाई की दुकान से लेकर ड्राइंग रूम की टेबल तक ये पत्रिकाएं कई हफ्तों तक हाथों-हाथ घूमती थीं।
सेट से जुड़ी खबरें, सितारों के इंटरव्यू और रंगीन तस्वीरें दर्शकों को पर्दे के पीछे की दुनिया से जोड़ती थीं। किसी सीन के सेट का किस्सा या शूटिंग का अनुभव पढ़कर पाठक फिल्म में और दिलचस्पी लेने लगते थे।
प्रिंट मीडिया का यह दौर सिर्फ जानकारी देने तक सीमित नहीं था, बल्कि वह फिल्म और दर्शक के बीच एक गहरा लगाव पैदा कर देता था।
रेडियो और टीवी की आवाज़
दोपहर के शांत पहर में जब रेडियो सीलोन या विविध भारती पर अनाउंसर की भारी और मीठी आवाज़ गूंजती, तो लोग कान लगाकर सुनते थे। रेडियो पर फिल्म के डायलॉग्स की छोटी-सी झलक और बैकग्राउंड स्कोर से ही हवा में रोमांच घुल जाता था।
बिना किसी विजुअल के, सिर्फ आवाज और धुन के सहारे लोग अपने दिमाग में फिल्म की कहानी और किरदारों की तस्वीर खुद गढ़ लेते थे। उस दौर में आवाज़ की अपनी एक अलग ताकत थी।
फिर दूरदर्शन के दौर में चित्रहार और रंगोली जैसे कार्यक्रमों ने फिल्म प्रचार को सीधे ड्राइंग रूम के टीवी सेट तक पहुंचा दिया। पूरा परिवार स्क्रीन के सामने बैठता था ताकि नए गानों की पहली झलक देख सके।
उन गानों के बीच आने वाला बीस सेकंड का छोटा सा वीडियो प्रोमो दोस्तों के बीच बातचीत का मुख्य विषय बन जाता था। स्कूल और कॉलेज के ग्राउंड्स में उसी प्रोमो के सीन्स की चर्चा होती।
केबल टीवी के आने के बाद म्यूजिक काउंटडाउन शोज़ ने गानों की लोकप्रियता दिखाकर फिल्मों के इर्द-गिर्द एक नई हलचल पैदा कर दी। स्क्रीन पर गाने और प्रोमो देखकर लोगों को फिल्म के बारे में और बातें करने का एक नया मौका मिल गया।
ऑडियो कैसेट और सुरों का असर
90 के दशक में फिल्म का संगीत सिर्फ सुनने का ज़रिया नहीं था, बल्कि प्रमोशन का एक बड़ा हिस्सा था। फिल्म रिलीज़ होने से हफ्तों पहले ही बाज़ार में ऑडियो कैसेट्स पहुंचने लगती थीं।

दुकानों, चाय के केबिनों और लोकल गाड़ियों में बजने वाली कैसेट्स लोगों तक फिल्म की पहली धुन पहुंचाती थीं। लोग अपनी पसंद के गाने सुनने के लिए कैसेट खरीदते और उन्हें बार-बार रिवाइंड करके सुना करते थे।
अगर गाने लोगों की ज़ुबान पर चढ़ जाते, तो फिल्म का नाम रिलीज़ से पहले ही घर-घर तक पहुँच चुका होता था। संगीत लोगों के मन में उस फिल्म को देखने की चाह पैदा कर देता था।
म्यूजिक कैसेट के इनले कार्ड पर छपी एक्टर्स की तस्वीरें और गानों के बोल लोग संभालकर रखते थे। वह कार्ड अपने आप में एक छोटा सा पोस्टर बन जाता था, जिसे लोग अपने पास रख सकते थे।
दर्शक पहले गानों की धुन से जुड़ते थे और कई बार यही जुड़ाव उन्हें उस फिल्म के बारे में और जानने और उसे देखने के लिए टिकट खिड़की तक ले आता था।
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स्टार पावर और परदे का जलवा
उस दौर में एक्टर्स को अपनी फिल्म के लिए बहुत ज्यादा प्रमोशनल इवेंट्स करने की जरूरत नहीं पड़ती थी। स्टार का नाम और उसकी एक झलक ही पब्लिसिटी का सबसे बड़ा हथियार हुआ करती थी।
अमिताभ बच्चन की मौजूदगी, खान तिकड़ी का नया अवतार या गोविंदा का चिर-परिचित अंदाज़—सिर्फ उनके नाम की घोषणा ही दर्शकों के बीच उत्साह भरने के लिए काफी थी।
सितारों की सीमित पब्लिक अपीयरेंस उनके चारों तरफ एक रहस्य बनाए रखती थी। दर्शक उन्हें केवल बड़े पर्दे पर देख सकते थे, इसलिए उनकी नई फिल्म का आना अपने आप में एक बड़ा आकर्षण बन जाता था।
फैंस अपने पसंदीदा हीरो के स्टाइल और लुक को फॉलो करते थे। पोस्टर पर स्टार का चेहरा दिखना ही फिल्म के लिए शुरुआती ध्यान और उत्सुकता पैदा करने के लिए काफी हो सकता था।
उस समय स्टार की ऑन-स्क्रीन पहचान ही फिल्म की शुरुआती पब्लिसिटी को मजबूती देती थी।
वर्ड ऑफ माउथ और चर्चा
शुक्रवार का पहला शो खत्म होते ही 90 के दशक का सबसे मजबूत प्रचार तंत्र सक्रिय हो जाता था—माउथ पब्लिसिटी।
हॉल से बाहर निकलकर दर्शक चाय की गुमटी पर, बस स्टॉप पर या दोस्तों के बीच जो बात कहते थे, वह फिल्म की आगे की चर्चा और दर्शकों की दिलचस्पी पर असर डाल सकती थी। दर्शक सिर्फ फिल्म देखने वाले नहीं थे, वे उस पब्लिसिटी को आगे बढ़ाने वाले भी बन जाते थे।

एक दोस्त का दूसरे दोस्त से यह कहना कि ‘फिल्म देखने लायक है’, किसी भी बड़े विज्ञापन अभियान से कहीं ज्यादा असरदार साबित होता था। लोगों की निजी राय ही तय करती थी कि फिल्म हफ्तों तक चलेगी या नहीं।
असल में 90s में फिल्म प्रमोशन कोई एकतरफा विज्ञापन नहीं था। पोस्टर, अखबार, मैगज़ीन, रेडियो, टीवी, संगीत और लोगों की आपसी बातचीत मिलकर फिल्म के इर्द-गिर्द एक पूरा माहौल बनाते थे।
यानी लोग सिर्फ फिल्म का विज्ञापन नहीं देखते थे, वे उसकी चर्चा धीरे-धीरे अपने आसपास महसूस करते थे। यही वजह थी कि रिलीज़ से पहले का इंतज़ार भी फिल्म की पब्लिसिटी का हिस्सा बन जाता था।
लेकिन इन सभी माध्यमों में एक ऐसा माध्यम था जो फिल्म के पर्दे पर आने से बहुत पहले ही उसकी दुनिया रच देता था—संगीत।
क्या 90 के दशक में किसी फिल्म का गाना उसके विज्ञापन से भी बड़ा प्रचारक बन सकता था?
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
90s में नई फिल्म का पता कैसे चलता था?
दीवारों के बड़े पोस्टर्स, अखबार के पन्नों और रेडियो पर बजने वाले गानों से लोगों को नई फिल्म और उसकी रिलीज़ की पहली खबर मिलती थी।
क्या ऑडियो कैसेट्स से फिल्मों का प्रचार होता था?
फिल्म रिलीज़ से काफी पहले कैसेट्स दुकानों और गाड़ियों में बजने लगती थीं, जिससे गानों की लोकप्रियता सीधे फिल्म की पहचान बन जाती थी।
90s के दौर में टीवी का क्या रोल था?
दूरदर्शन के ‘चित्रहार’, ‘रंगोली’ और म्यूजिक काउंटडाउन शोज़ में आने वाले छोटे वीडियो प्रोमो नई फिल्मों की खबर घर-घर पहुंचाते थे।
माउथ पब्लिसिटी फिल्म के लिए क्यों जरूरी थी?
माउथ पब्लिसिटी जरूरी थी क्योंकि दर्शकों की राय ही दोस्तों-रिश्तेदारों तक फिल्म की चर्चा पहुंचाती और देखने के फैसले पर असर डालती थी।
❤️ आख़िरी बात
90 के दशक का सिनेमा सिर्फ बड़े पर्दे पर नहीं, बल्कि उस धीमे और मीठे इंतज़ार में भी बसता था। पोस्टरों की चमक और गानों की धुनें हर दिल में फिल्म के लिए जगह बना लेती थीं।
उस दौर का 90s Bollywood Film Promotion सिर्फ फिल्म की खबर पहुंचाने तक सीमित नहीं था, बल्कि दर्शकों के बीच धीरे-धीरे एक जुड़ाव बनाता था।
शायद इसी वजह से उस दौर में फिल्म का इंतज़ार भी उसकी यादों का हिस्सा बन जाता था।
✍️ Hasan Babu
Founder & Editor • Bollywood Novel
सिनेमा सिर्फ परदे की चमक नहीं, बदलते वक्त और समाज की कहानी है। मैं फिल्मों को गॉसिप से नहीं, उनके इतिहास और असर से समझता हूँ।
90s के सिनेमा को आज पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो सिर्फ फिल्मों की याद नहीं आती; उस दौर में लोगों तक सिनेमा पहुँचने का पूरा अंदाज़ भी नज़र आता है।
Hasan Babu हिंदी सिनेमा, बॉलीवुड इतिहास और फिल्म इंडस्ट्री के बिज़नेस मॉडल को समझाने वाले लेखक हैं।
वे Bollywood Novel के Founder हैं, जहाँ फिल्मों के अनसुने किस्से, गीतों की कहानियाँ और सिनेमा के पीछे छुपा असली खेल गहराई से सामने लाया जाता है।
यहाँ सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि यह भी समझाया जाता है कि फिल्म इंडस्ट्री कैसे चलती है, पैसा कहाँ से आता है और हिट–फ्लॉप का फैसला कैसे होता है।





